Sitala Puja 2019: जाने माँ सीतला को क्यों चढ़ाया जाता है बासी प्रसाद?

Sitala Puja 2019: माँ सीतला पूजा या सीतला पूजा का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व हैं. इस त्यौहार को हिन्दू केलेंडर के अनुसार चैत्र के महीने में कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है. विशेषकर सीतला पूजा राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और गुजरात में की जाती है और इन राज्यों में यह प्राचीन समय से चली आ रही हैं.

sitala puja 2019 Sitala Puja or Sheetla Ashtami का महत्व 
Sitala Puja or Sheetla Ashtami का महत्व

सीतला अष्टमी (Sheetla Ashtami) पर लोग ठंडा खाना खाते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ठंडा खाना खाने से शीतला मां प्रसन्न होती हैं. इस दिन महिलायें व्रत रखती है. इस व्रत में एक दिन पहले ही भोजन बना लिया जाता है. इसे हम बसोडा के नाम से जानते हैं. लोग शुबह जल्दी उठकर माँ सीतला की पूजा करते हैं और उसे बासी प्रसाद चढाते है. लेकिन अधिकतर लोगो को पता नहीं होता कि माँ सीतला को बासी प्रसाद क्यों चढ़ाया जाता है? तो हम आपको बताएँगे कि माँ सीतला को बासी प्रसाद क्यों चढ़ाया जाता है? और इसका हिन्दू धर्म में क्या महत्व हैं.

क्यों चढ़ाया जाता है माँ सीतला को बासी प्रसाद?

सीतला अष्टमी (Sheetla Ashtami) पर लोग ठंडा खाना खाते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ठंडा खाना खाने से शीतला मां प्रसन्न होती हैं. इस दिन महिलायें व्रत रखती है. इस व्रत में एक दिन पहले ही भोजन बना लिया जाता है. सीतला माँ की पूजा करने के लिए महिलाये शुबह जल्दी माँ सीतला की पूजा करती हैं और बासी प्रसाद चढ़ाती हैं जिसे हम बासोड़ा कहते हैं. इसी बासी भोजन से महिलाये अपना व्रत पूरा करती हैं.

ऐसा कहाँ जाता है कि माँ सीतला, दुर्गा और पार्वती का अवतार है और उसे रोगों को दूर करने की शक्ति प्राप्त हैं. इस लिए लोग अपने परिवार के सदस्यों को रोगों व कष्टों से बचाने के लिए माँ सीतला पूजा की जाती हैं. इसका हिन्दू धर्म में बहुत महत्व हैं और इस पूजा को कई कारणों से भी किया जाता हैं.

Sitala Puja or Sheetla Ashtami का महत्व 

हम सभी यह तो जान गए कि माँ सीतला का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं और जो भी व्यक्ति या महिला यह व्रत करता है उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के सभी रोगों और ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते हैं.

इस व्रत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें शीतला माता को भोग लगाने वाले सभी पकवान एक दिन पहले ही बना लिए जाते हैं और दूसरे दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है. यही कारण है कि इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं. मान्यता तो ये भी है कि शीतला सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नही जलाया जाता है अर्थात उस दिन घर के सभी सदस्यों को बासी भोजन ही खाना पड़ता है.

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